क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे,
क्या इनको नहीं दिखती गांव घर की मां बहन बेटियां ,
तो आखिर इनके घर कौन बनाता है रोटिया ,
क्या लिखूं मैं इंसानों के बारे में ,
मेरी कलम शर्म से डर गई,
जैसे मैं इंसान लिखा तो खुद म खुद ,
मेरी कलम लिखदी की इंसानियत तो मर गई,
क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे,
परिया निकली नहीं घर से कि बाज पैर मारने लगते है ,
ये जल्लाद मां बहन बेटियों को ताडने लगते हैं,
मै भगवान से रोज यही प्रार्थना करता हूं ,
कि किसी मॉ बहन बेटियों की इज्जत पर आंच ना आए ,
बेशक दो चार जल्लाद बेमौत मर जाए ,
क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे,
मै भाई का छोटा भाई लिख तो रहा हूं पर शायर नहीं हू ,
और किसी मां बहन बेटियो के ईज्जत पर ,
कोई किचड़ उछाले और मैं चुप खड़ा रहूं इतना बड़ा कायर तो नहीं हू ,
क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे,
आप सब से हाथ जोड़कर विनती है,
कि संभाल कर रखना अपनी फूल जैसे औलाद को,
ये जल्लाद बेऔलाद बैठे हैं ,इनको क्या कहूं जिनको शर्म ही नहीं,
ये शर्म को घोल कर पी बैठे हैं ,
मैं ये इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि आज है 24 जनवरी ,
बल्कि इसलिए लिख रहा हूं की हर रोज दम तोड रही अपनी एक परी,
क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे,
क्यू कर रहे हो जल्लादों हम सब को बिबस ,
आंसू आ गए कैसे बताऊं कि आज है बालिका दिवस,
क्या लिखूं मैं अपने अल्फाज में , जब इंसानियत ही नहीं रही इंसान मे.....✍️
~~भाई का छोटा भाई~
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