आस्मां अपना है यारों ये ज़मीं है मेरी ,
किस्मत में बस यही छोटी सी कमी है मेरी ,
लोग खिलाफ़ है मेरे तो खिलाफ़ रहने दो ,
ज़िंदा हूँ तो मुखालफ़त भी लाज़मी है मेरी ,
कोई आकर दिलासा देदे मुझे कि आज ,
दिल उदास है और आंखों में नमी है मेरी ,
जिम्मेदारियों के कारण आज घर से दूर हूं ,
तो भाई फ़ोन करता है कि कमी है मेरी ,
परिवार व मां बाप की याद आती है ,
तो आंखें नम हो जाती है मेरी ,
क्या करूं रखवाला हूं सरहद का मै,
इसीलिए तो मां के पास कमी है मेरी ,
मेरी जन्म देने वाली मां को मेरे भाई संभाल लेगे,
पर जब से सरहद पर आया हूं तो पहले धरती मां है मेरी ,
क्या करूं मुझे भी अपनी जननी मां की याद आती है ,
रो देती होगी मेरी मां जब उसको महसूस होती होगी कमी मेरी ,
कैसे कहूं मां की सबसे पहले है , यह भारत की जमी मेरी,
पापा का फोन आया बोले वहां बहुत सर्दी होगी क्योंकि वहां है तू रेत में ,
मैंने कहा पापा इतनी सर्दी नहीं जितनी वहा पानी लगाते समय रहती है खेत में,
इस कविता में मैंने अपनी और परिवार वालों ने मेरी कमी बताई ,
यह कविता लिखने वाला मै भाई का छोटा भाई....✍️
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