मेरे नाम की मेेहंदी अपने हाथो से मिटाने लगे हैं । किसी ओर से ओ शादि रचाने लगे हैं । जो कभी मेरे मंदिर की मूरत हुआ करती थीं । ओ कीसी ओर के साथ घर बसाने लगी हैं । BY - Deepak Bhardwaj Singh
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