ज़माने के तो गम सुलझा रहा हूँ, मगर मैं खुद उलझते जा रहा हूँ !
ये दुनियां कब किसी को मानती हैं, मैं अपने आप को मनवा रहा हूँ !!
ये क्या दिन आ गए हैं जिंदगी में, मैं अपने आप से ऊबता रहा हूँ !
ओ धोका दे तो उसकी क्या खता हैं, खता मेरी हैं के धोका खा रहा हूँ !!!
A conversation in words
0 commentsLog in to join the conversation.