आज उस काग़ज़ पे, ज़िन्दगी की कोई दास्ताँ लिख रहा हूँ, जिस कागज़ को, किसी पेड़ की ज़िन्दगी छीन के, बनाया गया होगा..
A conversation in words
0 commentsLog in to join the conversation.