पूछते है लोग मुझसे ये अल्फाज़ कहाँ से लाता हूँ,
बहते है रोज जो आंसू मेरे,
मै उन्ही को लिखते जाता हूँ
हो गया हूँ मै भी बस एक चाक के जैसा,
लिखते है वो कहानी अपनी
और मिटता मै चला जाता हूँ
एक दिन वो था ढूंढ लिया था मैंने खुदा अपना
एक दिन ये है,मै खुद को भी नहीं ढूंढ़ पाता हूँ
समझने लगे है अब तो वो खुद को खुदा जैसे,
हाँ वही,सामने जिसके मै सर अपना झुकाता हूँ
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