बिखरा हुआ हूँ मै.
कुछ रंज है, कुछ कड़वाहट है, अपने आप से ख़फ़ा हुआ हूँ मै.
कुछ वादे, बातें, सूखे पत्ते और बहुत सारा दर्द,
ना जाने क्या क्या लेके बढ़ा चला हूँ मैं.
अजीब सी कशमकश रहती है दिल में ना जाने क्यूँ,
फिर भी दिल को बहलाकर बढ़ा चला हूँ मैं.
लोग, दुनिया, समाज सबको दिखता है सिर्फ रंग चेहरे का,
किसी को क्या मालूम कि कितना बिखरा हुआ हूँ मै.
किसी को क्या मालूम कि कितना बिखरा हुआ हूँ मै.
Writer’s notebook
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