इक नाम जोड़ के बहुत शर्मिंदा हूं तूं नही मुझमे क्या फिर भी मैं जिंदा हूं जिंदगी यूं ही बसर गुजर जाएगी तन्हा मैं जो हौशलों के छत का बासिन्दा हूं ।
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