इक आईना है जो चेहरा देख के जल उठता है,
एक किताब है जो कहानी खुद की बताती है,
इक ऐसी जिंदगी है ना ख्वाब अच्छे आते हैं
ना नींदें वफ़ा दिखाती है~
रविकांत मिश्रा
(बी.ए एल एल.बी)
गोरखपुर विश्वविद्यालय
Writer’s notebook
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* तुमको लिखा *
जो भी लिखा तुम्हें,कम लिखा
तुमको खुशियां, खुद को गम लिखा
खुद को कभी,तुम्हे हरदम लिखा
खुद को ख़ंजर, तमको मरहम लिखा
जितना भी लिखा तुमको,कम लिखा ।
#(5- अप्रैल शाम 9 बजे ,जब पूरा हिंदुस्तान दिया जला रहा है)#
है बुझने को जिस्मे दिया यहां
वो खुद अब रौशनी में जल रही होंगी
तस्वीरें-कैद को अब,वो खूब मचल रही होंगी
सूरज से सज़दे का हुनर तो जैसे आता ही नही उनको
चंद तारों की बातों में अब वो बखूब फिसल रही होंगी
इक आधा बरष गुजरने को है,
ये जिस्म बसर तन्हा मरने को है,
है तूं चाँद किसी महफ़ूज छत की
किसी की छत फ़क़त गिरने को है,
इक नाम जोड़ के बहुत शर्मिंदा हूं
तूं नही मुझमे क्या फिर भी मैं जिंदा हूं
जिंदगी यूं ही बसर गुजर जाएगी तन्हा
मैं जो हौशलों के छत का बासिन्दा हूं ।
बस एक बेबाक हुनर कर गया हूँ मैं
सबके दिल से अब उतर गया हूं मैं
मुस्कराएं किस वजह को कोष के
सुन रहा तेरे घर गया हूँ मैं
बोलू क्या,मैं मर भी नही पाता
जीते-जी जबसे मर गया हूँ मैं
लोग मलते हैं हाँथ अपनी
की कैसे जिंदा हूं पर मर गया हूँ मैं ।
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