दीवारो-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं।
सुनने की मुहलत मिले तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं।
कैसे कह दूँ की सरकार गुनाहगार नहीं है...क़ातिल है मगर हाथों मे तलवार नहीं है
कितने घरों के चिराग बुझ गये एक पल में...ऐसे जुर्म पे भी हुकूमत शर्मसार नहीं है।
तेरे ना होने से जिंदगी में बस इतनी सी कमी रहती है,,
मैं चाहे लाख मुस्कुराऊ, आँखों में नमी सी रहती है !! :(
सांस तो चलती रहती है मेरी ब-दस्तूर ,,
ये धड़कने ही कुछ थमी थमी सी रहती है !!
वो नज़ारे जो कभी शौक़-ए-तमन्ना थे मुझे
कर दिए एक नज़र मे ही पराये उसने
रंग-ए-दुनिया भी बस अब स्याह और सफ़ेद लगे
मेरी दुनिया से यूँ कुछ रंग चुराए उस ने ..