पल पल को बदलता है रंग गिरगिट की तरह वक़्त ये जिसके हाथों से निकल जाए फ़िर उसका ना ताज रहे ना तख्त ओ वक़्त हाय वक़्त तू कहां कहां पहोंच गया बे वक़्त फ़कीर बादशाह साब ( FAKEERA)
A conversation in words
0 commentsLog in to join the conversation.