“छलक-छलक पड़ीं आँखों की गागरें अक्सर, सँभल-सँभल के ये पनहारियाँ नहीं चलतीं । जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की, यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं…।”
A conversation in words
6 commentshIzuNpQq
vcnpCKWuJsow
vcnpCKWuJsow
UuJytOsRn
wCIZLFuztcMiGxHs
wCIZLFuztcMiGxHs
Log in to join the conversation.