अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर के हम हैं! रुख हवाओं का जिधर का हैं उधर के हम हैं !!
चलते रहते हैं कि चलना हैं मुशाफिर का नसीब ! सोचते रहते हैं किस राहे गुजर के हम हैं !!
वक़्त के साथ हैं मिट्टी का सफर सदियो से ! किसको मालूम हैं कहाँ के हैं किधर के हम हैं !!!
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