जहाँ भी ज़िक्र हुआ सुकून का.. वहीँ तेरी बाहोँ की तलब लग जाती हैं।
गलतफहमी की गुंजाईश नहीं सच्ची मोहब्बत में, जहाँ किरदार हल्का हो, कहानी डूब ही जाती है।
मोहब्बत की शतरंज में वो बड़ा चालाक निकला, दिल को मोहरा बना कर हमारी जिन्दगी छीन ली।
मुझे तलाश है उन रास्तों कि, जहां से कोई गुज़रा न हो, सुना है.. वीरानों मे अक्सर, जिंदगी मिल जाती है।
कागज के बेजान परिंदे भी उड़ते है, जनाब, बस डोर सही हाथ में होनी चाहिए।
शायरी भी एक खेल है शतरंज का, जिसमे लफ़्ज़ों के मोहरे मात दिया करते हैं एहसासों को।
मुझको छोड़ने की वजह.. तो बता देते, मुझसे नाराज थे या मुझ जैसे हजारों थे।
कोशिश हज़ार की के इसे रोक लूँ मगर, ठहरी हुई घड़ी में भी.. ठहरा नहीं ये वक्त।
एक चाहत थी.. तेरे साथ जीने की, वरना, मोहब्बत तो किसी से भी हो सकती थी।
"एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक लोहार की दुकान थी। सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार काम करता तो उसकी दुकान से कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती। एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार की दुकान में आ गिरा। वहाँ उसकी भेंट लोहार के एक कण के साथ हुई। सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को ही एक समान आग में तपाया जाता है और समान रूप ये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है। मैं ये सब यातना चुपचाप सहता हूँ, पर तुम बहुत चिल्लाते हो, क्यों? लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहा- तुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है। मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा सगा भाई है। परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट अधिक पीड़ा पहुचाँती है" दिल को छू जाने वाली बात
अक्सर ठहर कर देखता हूँ अपने पैरों के निशान को, वो भी अधूरे लगते हैं... तेरे साथ के बिना।
मेरी ये बेचैनियाँ... और उन का कहना नाज़ से, हँस के तुम से बोल तो लेते हैं और हम क्या करें।
हर साँस में उनकी याद होती है, मेरी आंखों को उनकी तलाश होती है, कितनी खूबसूरत है चीज ये मोहब्बत, कि दिल धड़कने में भी उनकी आवाज होती है।
सितम को हम करम समझे, जफा को हम वफा समझे, जो इस पर भी न समझे वह तो उस बुत को खुदा समझे।
ना हीर की तमन्ना है, ना परियों पर मरता हूँ, एक भोली-भाली सी लड़की है, मैं जिससे मोहब्बत करता हूँ।
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