“मैं उनसे आज तक कभी पाया नहीं गया,
जानॉं ! जो मेरे शौक़ के आलम मिले तुम्हें !
यूँ हो कि कोई और ही हव्वा मिले मुझे,
हो यूँ कि कोई और ही आदम मिले तुम्हें..!”
(बाप जी) भाईं तेरी यादें ,
वाह क्या किया करते थे वादे,
तू तो जैसे गुलाब का फूल हो गया ,
भाई एक बार बताना तो क्या मुझसे भूल हो गया ,
आखिर क्यों नहीं उठाता मेरा फोन ,
क्या नहीं बजती तेरे मोबाइल में रिंगटोन ,
या फिर ज्यादा बिजी है तो समय नहीं मिलता ,
जैसे गर्मियों में फूल नहीं खिलता ,
भाई इतना एटीट्यूट भी ठीक नहीं ,
दो शब्द बात करने को ही तो बोल रहा हूं ,
तुझसे माग रहा भीख नहीं ,
आखिर क्यों मेरे संदेश को देख कर भी अनदेखा कर देते हो,
क्यों रिप्लाई में एक शब्द नहीं लिख देते हो ,
मैं ज्यादा व्यस्त हूं ,
मैं तुझसे बात करूं मैं वो नहीं शख्स हू ,
आखिर क्यों नहीं लिख देते,
कि मुझमे अब वो बात नहीं ,
वादा किया करता था जो अब वो रात नहीं,
वाह सचिन दादा आपकी बात ही निराली है ,
क्या लिखूं आपकी तारीफ में ,
मेरी तो जुबान भी काली है,
मैं तो उस गुलाब के कांटे जैसे हू ना कि फूल ,
आपका एटीट्यूड जायज है मुझसे ही हो गई भूल ,
हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं अब मुझे माफ कर देन…